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प्रतिबिम्ब #27: शिमला में विज्ञान शिक्षकों का प्रशिक्षण

दुर्घटनावश शिमला में कुछ विज्ञान शिक्षकों को प्रशिक्षण देना पड़ा. ये जिला स्तर के प्रशिक्षक थे जो मेरी बकवास को आगे ट्रांसफ़र करने वाले थे. गुरुत्वाकर्षण पर कुछ गतिविधियाँ और चर्चा हुई. अच्छे से करो तो सालों से पढ़ा रहे शिक्षकों के दिमाग से भी कई गलत अवधारणाएं बाहर कूद पड़ती हैं जिनके लिए खामखाँ बच्चों की परीक्षा में वाट लगा दी जाती है. (इसकी बात नहीं करुंगा कि एक दिन पहले उन्होंने तंत्र और प्रशिक्षण के विरुद्ध आवाज उठाते हुए मेरी भी वाट लगाई थी). कुछ शिक्षक अपने ज्ञान के बारे में इस खुलासे से थोड़े असहज थे. सत्र ख़त्म हो ही रहा था कि एक शिक्षक ने कुटिल मुस्कान से लबरेज ब्रह्मास्त्र दागा “आप न्यूटन या आइन्स्टाइन या गुरुत्वाकर्षण वगैरह कुछ भी बताओ, ये सब तो हमारे वेदों में है”.

कुछ महीने पहले थीमा प्रकाशन की The Scientist in Society में मेघनाद साहा का अनिल्बरान रॉय को दिया हुआ प्रतिउत्तर पढ़ रहा था- शन्ति निकेतन में उनके दिए गए भाषण पर रॉय ने वैदिक ज्ञान के डिफेंस में उनपर भी यही ब्रह्मास्त्र चलाया था. साहा की तो औकात थी इसलिए वे रॉय पर पिल पड़े, यहां मैं नाचीज फंस गया. विनम्रता से कहा “इससे मैं असहमत हूं.” उसके बाद अन्य शिक्षकों से कुछ और ‘तथ्य’ फायर हुए:
“बिग बैंग के बारे में वेदों में है”
“जितने नोबल प्राइज मिले हैं सब हमारे यहां से चुराए हुए हैं और अपना बताते हैं”
मैंने कहा “इस तरह की चीजें मैंने भी सुनी हैं पर क्या आपने कभी ऐसी खबर देने वालों को साइटेशन देते हुए भी सुना? ‘इस वेद के इस श्लोक में गुरुत्वाकर्षण का नियम और बिग बैंग है, जाकर कन्फर्म कर लीजिए और देखिए इन फिरंगियों की चोरी!’ ऐसा कहीं नहीं मिलेगा.”

“अरे सब कुछ था. इन्होने चोर कर डिस्ट्रॉय कर दिए. रावण का जहाज था- वो पारे mercury की पावर से चलता था.”
“जर्मनी वाले संस्कृत पर रिसर्च करने में लगे हैं. क्यों?”
“हमने तो सुना है कि चांद पर एलियंस रहते हैं. जब ये लोग वहां गए थे तो उन्होंने भगा दिया. इसीलिए तो अब चांद पर नहीं जाते हैं. आप बताओ अब क्यों नहीं जाते इंसान चांद पर?”
मैंने कहा “क्योंकि जरुरत नहीं है. और दूसरे तरीकों से चांद और अन्य ग्रहों पर जा रहे हैं.”
“वाह! सही बहाना है- अब इसलिए नहीं जा रहे हैं क्योंकि जरुरत नहीं है!”
“अलाहाबाद में एक मंदिर है जिसके पिलर जमीन ही नहीं छूते.”
“जी मुझे नहीं पता है तो मैं टिपण्णी नहीं कर सकता पर हाँ, बाकी सारी चीजों के बारे में कह सकता हूं कि वे वेदों में नहीं हैं. आर्यभट्ट, भास्कर या दूसरों के जो गणित या विज्ञान के कार्य संस्कृत में हैं वे वेदों में नहीं हैं और उन्हें पढने के लिए आपको कोई नहीं कहेगा.”
“आप तो वेदों को ही नहीं मानते! तो वेदों में कुछ नहीं है?”

“जी बहुत कुछ है. एक बार थोड़ा देखा था तो शुरू में बहुत से देवताओं की स्तुतियाँ थी और कहते हैं कि बहुत सारे कर्मकांड भी बताए गए हैं. पर गुरुत्वाकर्षण तो नहीं है. और ना ही नोबेल प्राइज वालों की खोजें और थ्योरी. धार्मिक तर्कों को बड़े छद्म तरीके से प्रस्तुत किया जाता है ताकि वे वैज्ञानिक तर्क लगें. पर उसपर और तर्क करो तो उनकी पोल खुल जाती है. धार्मिक किताबें अलग चीजों पर बात करती हैं…उनपर जबरदस्ती विज्ञान का ठप्पा लगाने पर क्यों तुले हैं? जब मैं इंजीनियरिंग कर रहा था तब चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के हवन में एक पंडित जी ॐ की कहानी सुनाते थे (गनीमत है किसी ने इंजीनियरिंग और हवन का कोरिलेशन नहीं पूछा): ‘पंखा घूमता है तो आवाज आती है न? तो यह आकाशगंगा कितनी बड़ी है. उसके घूमने से आवाज नहीं आती होगी? विश्वामित्र को ध्यान में यह आवाज सुनाई दी जो ॐ है’. और हम सब सिर हिलाते…पंडित जी यह नहीं समझाते थे कि अंतरिक्ष के निर्वात में ध्वनि तरंगें कैसे चलकर हमारे कानों तक पहुंचती हैं. वे और ज्ञान भी देते थे- हमारे पूर्वज इतने ज्ञानी थे…हवन यज्ञ में आम की लकड़ी क्यों जलाते हैं? क्योंकि उससे ओजोन निकलती है. 100 ग्राम घी जलाने से 1 टन ऑक्सीजन निकलती है. शंख बजाने से TB के बैक्टीरिया मर जाते हैं.

..लोग हर दावे के बारे में कहते हैं ‘अजी गूगल में सर्च कर लो, सबूत मिल जाएगा’. पर गूगल में तो बहुत सारी बकवास चीजें (गू) भी मिलती हैं. आपको किसके पक्ष में सबूत चाहिए- वो मिलेगा. आपका जो विश्वास है उसके बारे में सर्च कीजिए, आपको सैकड़ों ‘सबूत’ मिल जाएंगे. मैं भी ब्लॉग या वेबसाइट बनाकर अपने पक्ष में चीजें लिख सकता हूं. विदेशों में कई लोग मानते हैं कि धरती चपटी है..उन्हें flat earthers कहते हैं. कुछ creationism मानते हैं- ईश्वर ने 6000 साल पहले 6 दिन में पृथ्वी की रचना की और सारे जीव बनाए…सृष्टिवादी यानी creationist के म्यूजियम में आपको डायनासोर और चड्डी पहने आदमी-औरत एक साथ मिल जाएंगे क्योंकि यह तो कह नहीं सकते कि जब डायनासोर थे तब इंसान नहीं था. समस्या सूचना की नहीं है. वह तो थोक के भाव उपलब्ध है. बल्कि यह है कि कौनसी सूचना सही है और कौनसी फर्जी. प्रशिक्षण और कक्षा में जो रटाते हैं कि ‘विज्ञान तथ्यों का व्यस्थिति समूह है’ उससे गलत कुछ नहीं हो सकता. विज्ञान के निष्कर्ष गलत साबित हो सकते हैं पर विज्ञान तो ignorance का celebration है. वह ज्ञान अर्जन की एक पद्धति है जो खुद को बदलने के तैयार रहती है और नहीं पता होने पर ‘हमें नहीं पता’ कहती है न कि ‘हमें सब कुछ पता है’. आप कुछ गलत साबित कर दो तो लोग ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करेंगे, आपका गला नहीं काटेंगे. वेदों और एलियंस के बारे में ऐसे दावे आप खुद कन्फर्म कर लीजिए. जब भी कुछ सर्च करें तो उसके पीछे ‘truth or myth?’ या ‘reality?’ जैसे शब्द भी लिखें और सूचना की तुलना करें.”

इसके बाद थोड़ी और बातचीत हुई. पर अच्छा यह लगा (और राहत भरा भी) कि किसी ने मेरा सिर नहीं फोड़ा और न सबने घेरकर जूतियाया. एक स्पष्ट और स्वस्थ चर्चा रही- भले ही हमारे विचार अंत तक अपनी जगह ही रहे हों. विज्ञान के शिक्षकों की मूल अवधारणाएं ऐसी हैं, इससे थोड़ा आश्चर्य हुआ पर अच्छे-खासे लोग बाबाओं के चरण चूमते हैं. अमरीकी, रुसी और भारतीय ‘वैज्ञानिकों’ के भी रॉकेट लॉन्च से पहले के कई कर्मकांड और अंधविश्वास हैैं. मेरे लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह है कि ये शिक्षक बच्चों से प्रेम करते हैं और कठिन परिस्थितियों में उनके लिए मेहनत करते हैं. हाँ, इस तरह के विश्वासों से आहत हो जाने और बरगलाए जाने की संभावना बढ़ जाती है जिसे लीडर लोग खूब भुनाते हैं, पर अगर केवल दैवीय शक्ति पर विश्वास करने से कबीर, मदर टेरेसा, विवेकानंद, मार्टिन लूथर जूनियर, बुद्ध जैसे प्रेमी लोग बनने की गारंटी हो तो भाड़ में गया विज्ञान और मायने नहीं रखता कि किसी को गुरुत्वाकर्षण या क्वांटम फिजिक्स बहुत अच्छे से आती है या नहीं. आखिर अहं में अकड़े, बाजार और तरक्की के जाल में फंसाने वाले, पर्यावरण-जीवों-मनुष्यों का बर्बर शोषण करने वाले, धार्मिक और राष्ट्रवादी कट्टरता फैलाने वाले धरती के सबसे शिक्षित लोग ही तो हैं. अक्सर मंदिर या मस्जिद में मत्था टेकने वाला आम श्रद्धालु इतना कहां सोच पाता है…जो हिंसा वह कभी-कभी अनायास कर बैठता है वह समाज और धर्म की विरासत में मिले पैकेज के कुछ कबाड़ का फल है. पर अच्छा बनने के किए देवता जरुरी नहीं हैं- ‘The path to simple human goodness does not need a supernatural roadmap’.

वैसे बाहर निकलते वक्त एक शिक्षक जो पूरे टाइम चुप बैठे थे, पास आकर बोले “रावण का जहाज! मैं तो कहता हूं कि क्या गारंटी है कि रामायण और महाभारत असली में हुए थे?” दाज्यू मल्लब पिटाकर ही विदा करोगे!!

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1. वैज्ञानिकों के कर्मकांड:

2. सृष्टिवादियों के विश्वास:

 
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Posted by on July 21, 2017 in Uncategorized

 

Reflection #26

In the grand scheme of things what matters? And is there really a grand scheme or is it just an illusion born out of the psychic deficit/ yearning of humans? Scientific research about the origin, nature and fate of the universe discusses the possibility of a universe that is neither created nor destroyed…with an arrow of time that is psychological, thermodynamic and cosmological…we remember the past only, never the future… Is the future already existent then, rather than being just a human notion of a going-to-come event? Has it all already happened then? Does that bring the ‘destiny’ demon back into picture with a scientific clout out of the domain of superstition?

Billions of us crawl this tiny planet engaged in the chores of life, with aspirations being pursued, some fulfilled, some altered, some shattered. Our religious conditioning, collective anthropocentrism and biological makeup naturally give arise to many questions then… Where does it all lead to for an individual? Is there a direction to it, an intent, a meaning, or is it a random and continuous construction that retrospectively seems to make a pattern out of our human projection of meaning to it? What is the biological or physical basis of emotions- ecstasy, pain, longing, fear, vulnerability, love…can it all be traced down to our biological make-up, our constitution at the atomic level, or is there more to it? Am I just an aggregate of these physical structures, the abstract just being the refined/ subtle version of the material, the ‘larger than parts’ effect of my physical being? If not, how can I experience that which does not have a physical basis? And if yes, then am I just a conglomeration of biochemical algorithms subject to the laws of physics and the forces of nature and society, giving the illusion of this abstract self? And the yearning for unity, companionship, offering the self to a person or to a cause, to feel of service and a little good to the world…where does this arise from? Is the overwhelming surge of emotions one feels just a super-complex firing of the neurons…is the devotion to someone that overhauls one life to a different universe just a chemical state of the brain at its core?

Yes, science says to all these questions…it’s blunt and not assuring but that is the currently known truth. To acknowledge a non-material non-physical non-indifferent nature of universe is to accept the supernatural and abuse the real. What’s the harm in such a nature of the universe? Why does purposelessness of life, indifference of physical laws to us and a totally physical nature of our existence feel threatening? One yearns for the universe to care for oneself…for there to be guarding angels, for prayers/ wishes to be answered. But the universe doesn’t care! That’s the beauty of it, or ‘cold hard truth’ as one prefers! Yes there are complex questions…Why does a ‘whole’ human being feel a deep void that propels him to seek out companionship, meaning, and fulfillment in the world outside? Where does the excruciating need for oneness arise in love…suddenly a lacuna created in a wholesome life until then? What makes one restless, hopeful or anxious with thoughts of the future…with predictions of a future which is probably non-existent from a past equally non-existent except in the state of those neurons? What strange and unfathomable dynamics are set in motion for the individual the moment his biological entity is brought forth into existence out of no choice of his? And where does the incessant torture of humans and animals fit in all this…the extremes of beauty and extremes of pain coexisting in different bodies and different geographies on this planet at the same time? To ask these questions seems a very futile and even worthless task at times but they are part of the human condition, compounded by our modern unnatural society which has severed us forever from the good aspects of our hunter-gatherer tribal life.

 
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Posted by on June 15, 2016 in Uncategorized

 

गप्पें

गप्पों को पूज्यनीय बनाना जरुरी हो गया है |

टी.वी., मोबाइल, अखबार, इन्टरनेट पर चीखते करोड़ों शब्दों के बीच

गपियाती आवाजों को बचाए रखना जरुरी है,

अगर बचाए रखना चाहते हैं हम अपनी इंसानियत को |

शब्द से तर हो चुका है हवा का ज़र्रा-ज़र्रा

पर वो मात्र भाषा की प्रदूषित उपज लगता है |

कार्यस्थल और अर्थव्यवस्था की उत्पादकता के लिबास में

अपनत्व से हर कोई डरता है…और रोग की भांति उसे कुचल दिया जाता है |

‘मैसेज’ के खारे महासागर में रहते-रहते

आमने-सामने बैठ गपियाने की आदत नहीं रही,

या अब डर लगता है उससे…

कल अगर मोबाइल और टी.वी. ख़तम हो गए,

तो घरों में पसरा हुआ सन्नाटा हाहाकार मचा देगा

और अपनों के बीच ही असहज हो जाएँगे हम |

इसलिए जरुरी हो गया है गप्पों को महिमामंडित करना…

जरुरी हो गया है माँ-बाप का बच्चो से गपियाना

शिक्षक का बच्चों से गपियाना

बॉस का सहकर्मियों से गपियाना

पति का पत्नी से गपियाना

बच्चों का बुड्ढों से गपियाना

हर किसी का किसी अनजान से गपियाना…

शायद इससे उप्तापदकता में कुछ कमी आए

या इंसानी रिश्तों की जटिलता से रूबरू होना पड़े,

पर इंसानियत जी भर कर खिलेगी |

 
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Posted by on April 7, 2016 in Uncategorized

 

प्रतिबिम्ब #25

मैं सहकर्मी मित्र के साथ स्कूल की चारदीवारी के निर्माण कार्य का निरक्षण कर रहा था । आखिरी के पीरियड चल रहे थे और कक्षा 3 और 4 के बच्चों का खेल का समय था । स्कूल के मैदान में शिक्षक लड़कों के साथ खेलते हैं और लड़कियां किनारे में अपनी जगह ढूंढ लेती हैं, अक्सर बातें करने के लिए और कभी खेलने के लिए । कक्षा 4 की कुछ लड़कियां भवन के किनारे पर बैडमिंटन खेल रही थी; उनके साथ कुछ लड़के भी खेल रहे थे । मुझे बच्चों को खेलता देखना या अन्य स्वैच्छिक गतिविधि में लिप्त देखना पसंद है, इसलिए मैं उन्हें देखने लगा । मेरे पास में एक लड़की एक पेड़ से छोटा सा फल तोड़कर खा रही थी । मैंने उससे बात करनी शुरू की और उससे पुछा कि वह क्यों नहीं खेल रही है । स्कूल के बाद उसका पढाई और संगीत का ट्यूशन था इसलिए वह खेल कर थकना नहीं चाहती थी । पर वह कभी-कभी खेलती भी है । संगीत में रूचि के बारे में पूछने पर उसने बताया कि उसे तबला बजाना बहुत पसंद है पर मुझे आश्चर्य हुआ कि संगीत के ट्यूशन में वह तबला का ट्यूशन नहीं जाती । “क्यों ?” उसने चुप-चाप सिर हिला दिया | “अरे, पर  क्यों ?”…उसने फल खाते-खाते, आँखें नीचे कर धीमे से कहा “क्योंकि मैं लड़की हूँ” । मैंने स्कूल में इस असमानता को देखा था- असेंबली में लड़कियां हारमोनियम बजती हैं और लड़के तबला, पर उस बच्ची के यह अपने मुंह से कहने पर उसकी आवाज़ में जो तड़प थी, जो चाह थी …जो लज्जा थी, उससे मेरा ह्रदय द्रवित हो उठा ! उसने बताया कि कक्षा 7 में उसका भाई एक शिक्षक से 3 साल से तबला सीख रहा है । उसने उसे देख-देखकर तबला सीख लिया । बड़े गर्व से बोली “मुझे सब कुछ आता है जो उसे आता है । मैंने कुछ कम्पटीशन में भी भाग लिया है और इनाम जीता है ।” “और कितनी लड़कियां थी कम्पटीशन में?” “कोई नहीं । मैं अकेली थी ।” “पर तुम्हारा भाई सीखता है तो तुम भी तबला का ट्यूशन क्यों नहीं लगा लेती ?” उसने चुप-चाप सिर हिलाया । “पर क्यों ?” वह फिर धीमे से बोली “क्योंकि मैं लड़की हूँ “ ! जी मैं आया उसके कंधे पर हाथ रखकर खूब प्रोत्साहित करूँ और ऐसे ही संघर्ष करते रहने को कहूँ, पर उस वक्त सही नहीं लगा । मैंने कहा “तुम असेंबली में तबला बजाने देने के लिए शिक्षकों से क्यों नहीं कहती ?” पर उसने फिर चुप-चाप मना कर दिया…शायद अभी इतनी हिम्मत नहीं थी और स्कूल सरे बच्चों के सामने ऐसा नया काम करने वाली पहली लड़की होने की घबराहट भी । बहुत दुःख हुआ और गुस्सा आया कि कैसी शिक्षा जब वयस्क हर दिन होते इस भेदभाव को देख पाने में अक्षम हैं ! और कैसी शर्म की बात है कि एक बच्ची को इस छोटी उम्र में ही अपने नारी होने को शर्म और असहायता के लिबास में लपेटना सीखना पड़ा है ! कि उसने इस बात को अपने अस्तित्व का हिस्सा मानकर अभी से स्वीकार कर लिया है ! पर उसकी असीम संभावनाओं की झलक उसकी आवाज़ की तड़प और मासूमियत में दिखी, भाई को देख-देखकर सीखने की लगन में दिखी, गजब की हिम्मत से कम्पटीशन में अकेली लड़की होकर भाग लेने में दिखी, और उम्मीद बंधीं कि उसका हर दिन का यह विद्रोह एक दिन प्रचंड प्रवाह बनकर समाज की इन अमानवीय और दमनकारी मर्यादाओं को चकनाचूर कर डालेगा |

 
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Posted by on February 22, 2016 in Uncategorized

 

प्रतिबिम्ब #24

16 अगस्त 2014, मुंबई

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नाक से सिंगाड़ा बहता हुआ, हमेशा बहती हुई पैंट को एक हाथ से पकडे, पतली सी आवाज में स्कूल से आते हुए घर के सामने “भैया! ओ भैया!” चिल्लाना…अपनी बहन के कपडे पहनकर दौड़कर मेरे कमरे में आकर “फोटो खीचो!” कहना और फिर मेरे फ़ोन में अपनी फोटो देखकर देखकर हँसना और शर्मना…पूरे गाँव में बांकी बानर सेना के साथ नंगे पाँव दौड़ना, आपस में खितखिताट करना, एक दुसरे को लात घूंसे से कूटना, और फिर सुबह स्कूल में गंदे नाखून और चेहरे के कारण गुरूजी की कुटाई खाना ! दुनिया के आखिरी छोर में पहाड़ की ढलान पे उस गाँव में खेतों, पेड़ों, बकरियों, मुर्गियों, अम्मा-बुबू, और गाढ़-गधेरे के बीच खिलखिलाता हुआ वो 6 साल का तरुण….कुछ दिन पहले उसे नन्हे पौधे की तरह उखाड़कर काशीपुर शहर ले जाया गया- अब उधर ही रहेगा और पढ़ेगा…7 और 11 साल की उसकी दो बड़ी बहने अभी भी गाँव में ही हैं…उनके मोक्ष की शायद अभी कोई उम्मीद नहीं…वो गाँव में ही पढ़ाई करेंगी…जैसे-तैसे स्कूल पूरा करेंगी और ब्याह दी जाएंगी. उनका जीवन बच्चे पैदा करने और पति की सेवा करने के लिए है |

उत्तराखंड के गाँवों के हरे-भरे पहाड़ टूरिस्टों के लिए स्वर्ग है पर तरुण जैसे कल-कल करते झरने यहाँ बड़े होते-होते सूख जाते हैं…उनका कोई भविष्य नहीं…सिवाय देहरादून, दिल्ली या पंजाब के होटलों के जूठे बर्तन या पैसेंजर ढोती गाड़ियों की ड्रायवरी या कोई एक-अदद छोटी सी दूकान या फिर गिरते-संभलते बारहवी और कॉलेज पासकर वापिस गाँव में बेरोजगार बैठना | शायद इसलिए उसके परिवार ने ‘देवभूमि’ के इस श्राप से उसे बचाने के लिए बचपन में ही उसे शहर भेज दिया…शायद कल वो दुनिया से टक्कर लेने लायक बन जाए और नौकरी ढूंढ सके | बांकी भी इसी उम्मीद में जा रहे हैं धीरे-धीरे |

शायद अब वो 6 साल का बच्चा नहीं रहा…थोड़े समय में 6 साल का छोटा आदमी बनने वाला है |

 
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Posted by on January 28, 2016 in Uncategorized

 

प्रतिबिम्ब #23

आज कक्षा 10 के कुछ लड़कों ने कक्षा 7, 8, 9 के बच्चों का सत्र लिया | मेरी इच्छा थी कि स्कूल से उनकी विदाई केवल समारोह में आनंद और चिकन बिरयानी से न हो बल्कि आपस में कुछ संवाद और सीख बांटने से हो; उसलिये दो लड़कों से इस बारे में बात की जो किताबी ज्ञान और नंबरों के नशे से खुद को मुक्त कर कुछ अलग कर रहे थे | उनके दो और दोस्तों ने भी शामिल होने की इच्छा जताई |

सत्र उनकी व्यक्तिगत यात्रा और सीख के बारे में रहा…कैसे उन्होंने अपने जीवन को टटोल कर एक दिन कहा “बस ! बहुत हो गया !” और उस दिन से किताबों के बाहर अपनी रूचि की चीजें सीखने और मेहनत करने में जुट गए…कैसे इन्टरनेट के सकारात्मक उपयोग से उन्होंने बहुत फायदा हुआ…कैसे आज इस सब के कारण वो दसवी के बाद अपने भविष्य को आशा और आत्मविश्वास के साथ देख रहे हैं | उनकी अंतर्मन की आग देखकर बहुत ख़ुशी हुई !

समाज में और खासतौर से शिक्षा-पद्धति में बच्चों को केवल गृहण करने की भूमिका दी जाती है | और शिक्षा के थोड़े नवीन विचारों में उन्हें सृजन करने में शामिल किया जाता है पर यह सृजन अक्सर केवल विषय/ गतिविधि के भीतर ही होता है, केवल ‘ज्ञान’ का होता है, और केवल छात्र की व्यग्तिकत सीख को बढाने के लिए, भले वह सामूहिक रूप से कार्य करे | कम ही हम बच्चों को वयस्कों के समकक्ष मानकर उनको ‘बड़ों के काम’ और ‘बड़ों के साथ काम’ करने के रूप में देख पाते हैं…घर के और स्कूल के कामों में उनका प्रतिभाग करवाने के बारे में नहीं सोचते | इसके अलावा बच्चों की (और हर मानव की) दूसरों के साथ बांटने की प्रवृत्ति को भी अनदेखा किया जाता है- ताकि वो अपने हमउम्र या छोटे बच्चों को या बड़ों को भी अपने कौशल, ज्ञान, नजरिये, इत्यादि के जरिये मदद कर सकें, और किसी दुसरे के विकास में योगदान दे पाने का परम सुख अनुभव कर सकें | इसलिए मैंने इनमे से एक लड़के को, जो कंप्यूटर में खूब ज्ञान और कौशल रखता है, स्कूल की वेबसाइट बनने के काम में शामिल किया है…इसके अलावा जब पूरे स्कूल में इन्टरनेट लगाने के लिए कंपनी का सेल्स का कर्मचारी आया था तो मैंने उस बच्चे को प्रधानाचार्य, IT शिक्षक के साथ उस मीटिंग में स्कूल की तरफ से बात करने और सलाह देने के लिए बिठाया…आगे विचार था कि उससे स्कूल के शिक्षकों और अन्य स्टाफ का IT प्रशिक्षण भी करवाऊं | कुछ महीने पहले ‘वर्क एजुकेशन’ की कक्षा के शिक्षक न होने की स्थिति मैंने कक्षा 10 के बच्चों को हर हफ्ते उस पीरियड में खुद कक्षा लेने का विचार रखा जिसमें वे स्कूल पाठ्यक्रम के अलवा अपने अन्य रुचियों/ कार्यों के बारे में बातें साझा करें हो सके तो सहपाठियों को भी सिखाएं; एक कक्षा हुई भी जिसमें कक्षा में केवल गप्पें, मजाक और व्यवधान करने वाले लड़के ने, जो तबला वादन में बहुत अच्छा है, अपनी तालीम और तबले की बारीकियों के बारे में बताया और बड़ी जिम्मेदारी से खुद आकर कुछ दिन तक मेरे साथ उस कक्षा को प्रस्तुत करने की तैयारी भी की…(पर ज्यादातर बच्चों के वही छिछलेपन, मजाक, तानों और अरुचि के कारण यह और आगे नहीं बढ़ सका…हम स्कूल के अन्दर और बाहर अपनी सामाजिक प्रणाली में बच्चों की अंतर्प्रेरणा और उत्सुकता का कैसा क़त्ल कर रहे हैं कि वे हर चीज के प्रति ऐसी ही प्रतिक्रिया देते हैं ?!!) और इस सत्र का मुख्य मकसद भी इन लड़कों को स्कूल के अनुज छात्रों को अपना अनुभव और सलाह बांटने का सुख का अनुभव कराना और इस प्रक्रिया में खुद पूर्ण और वृहद् होने की अनुभूति कराना था | ऐसे और अवसर स्कूलों और परिवारों में बनाए जाएं तो अत्यंत सशक्त और मानव-प्रेम से ओत-प्रोत पीढ़ी का सृजन हो सकता है !

सत्र के दौरान एक प्रश्न आया कि पढाई करते वक्त एकाग्रता बनाने में दिक्कत होती है तो उसे दूर कैसे किया जाए | सत्र कराने वाले एक लड़के ने बड़ा गजब का उत्तर दिया: “सबसे बड़ी गड़बड़ ही यही है कि हम ‘पढाई’ करते हैं ! हम पढाई करते हैं (studying) जबकि हमें सीखना चाहिए (learning) | इसलिए मन मारकर किताबें पढ़ते रहते हैं, मन में केवल ज्यादा सवाल करने का और पाठ ख़त्म करने का विचार होता है | तो स्वाभाविक है कि ध्यान भटकेगा | कितना अजीब है कि हम कहते हैं ‘मन लगाकर पढो’..’जी-जान से पढो’ (study hard) जबकि ‘सीखना’ शब्द के साथ ऐसा कुछ नहीं कहा जाता क्योंकि वह आसान और स्वाभाविक है ! इसलिए उद्देश्य अगर मूल कांसेप्ट सीखना होगा तो गारंटी है कि ध्यान लगा रहेगा | तो अपने लिए ‘सीखने’ की कोशिश करो और इम्तेहान के लिए जी-जान से पढो !” दुसरे लड़के ने फेसबुक के अति इस्तेमाल के लिए भी ऐसी ही सुन्दर बात कही: “मैं भी फेसबुक का लती था | पर जब आँखें खुली और अन्दर आग लगी तो मैंने खुद फेसबुक को बंद कर इन्टरनेट का पूरा इस्तेमाल कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सीखने में लगा दिया | आज मैंने कई सॉफ्टवेर बनाये हैं, वेबसाइट्स बनायीं है, कोटा में IIT की पढाई की कोचिंग करने के लिए यहाँ त्रिपुरा में रहकर ही खुद सब कुछ मालूम किया और इम्तेहान देकर फीस में 70% स्कालरशिप भी हासिल की !”

यह महसूस हुआ कि आखिरकार सारा खेल ‘प्रेरणा’ का है | ये दो ही ऐसा क्यों कर पाए ? एक दिन किसी शिक्षक के कुछ कहने पर और किसी पुस्तक में कुछ पढ़कर उनकी चेतना और उत्साह जागा | बांकी साथी पुराने ढर्रे पर ही रहे | बेचैनी आ जाती है तो फिर चाह के भी रुक नहीं पाते हैं | सीखने की लालसा, उत्साह के कारण कुछ उसी माहौल में और उन्हीं संसाधनों का इस्तेमाल करके आगे बढ़ते जाते हैं और बांकी शिकायत करने और हंसी-मजाक में खोए रहते हैं | इस सत्र के दौरान भी कई बच्चे थे जो हमेशा की तरह आपस में गप्पें मारने और ताने मारने में मशगूल थे….थोड़े समय बाद वो उठकर चले गए | खुद बिना रूचि और तत्परता के दूसरा किसी के लिए कुछ नहीं कर सकता है…कोई सुनना ही नहीं चाहता, जगना ही नहीं चाहता, तो ब्रह्मज्ञान भी सुना दो तो वो भी निष्प्रभाव ही रहेगा | इसलिए कई बार लगता है कि सारे सत्रों/ व्याख्यानों/ वक्तव्यों में खुली छूट होनी चाहिए कि जो उठकर जाना चाहे वो जा सकता है क्यंकि इच्छा ही नहीं है तो बैठे रहकर भी कुछ नहीं होना है बल्कि वो बाकियों के लिए भी व्यवधान ही उत्पन्न करेंगे | वयस्कों/ शिक्षकों को भी प्रशिक्षण कुछ हद तक ही मदद कर सकता है पर अंतर्प्रेरणा के बगैर नौकरी फिर केवल काम और बोझ है और प्रशिक्षण नए दांव-पेंच नक़ल करने का मंच | किसी ने एक बार मुझसे कहा था “जानवरों को प्रशिक्षित किया जाता है…इंसानों तो केवल प्रेरित किया जा सकता है और कुछ नहीं !”

तो शिक्षा का मतलब और उद्देश्य क्या रहा ? बच्चों को प्रेरित करना…बेचैन करना | “सच्चा गुरु पीने को पानी नहीं देता है बल्कि और प्यासा कर देता है” | एक बार इंसान खुद का जिम्मा उठा ले तो फिर रास्ता खुद ढूंढ लेगा…तभी दुसरे के दिए संसाधन और मदद भी सार्थक हो पाएँगे | और छोटे बच्चे तो स्वभाव से ही उत्सुक और प्रेरित होते हैं…तो वास्तविक कार्य उनको प्रेरित करना नहीं बल्कि हमरी परवरिश और शिक्षा में उनकी प्रेरणा को मरने से बचाना है | शिक्षा व्यवस्था में या कभी गरीबी/ कठिनाइयों की चोट से जिनकी प्रेरणा मर जाती है उनके साथ कार्य करना चुनौती हो जाता है…फिर सारा खेल यही रह जाता है कि उन्हें कैसे दुबारा बेचैन और उत्साहित किया जाया ? और उसका कोई फार्मूला नहीं है – सारे दांव-पेंच लगाने पड़ेंगे | पर सबसे जरुरी होगा शिक्षक का स्वयं प्रेरित और बेचैन होना, और बच्चे के प्रति अनंत प्रेम होना जो बच्चे के तिरस्कृत करने पर भी, सारे प्रयास नकारने पर भी कोशिश जारी रखे…बस इस उम्मीद में कि जागृति  का वह क्षण, वह एहसास कब आए और किस तरह आए कुछ पता नहीं…वो आ गया तो सब कुछ सिद्ध हो जाएगा ! बस कर्मयोग करते जाना है |

सत्र के बाद एक साथी शिक्षक अत्यंत भावुक हो उठे…उन लड़कों ने जो अपनी प्रेरणा, अपनी मेहनत, अपना संघर्ष और सीखने की लालसा को साझा किया था वह उनके ह्रदय को छू गया । बोले “सत्र बहुत खूबसूरत था ! मुझे गर्व है कि ऐसे बच्चे मेरे स्कूल में हैं और मैं एक शिक्षक हूँ …”

 
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Posted by on January 21, 2016 in Uncategorized

 

प्रतिबिम्ब #22

क्या हमारे दैनिक जीवन की नैतिकता सहूलियत के अनुसार होती है और ‘आदर्श मनुष्य’ और ‘आदर्श नैतिकता’ की धारणा मिथ्या है ? हाँ शायद हममें से ज्यादातर मानेंगे कि मनुष्य की हत्या, बलात्कार, प्रताड़ना इत्यादि बुरे हैं जोकि कोई भी ‘सभी’ समाज/ मनुष्य कभी स्वीकार नहीं करेंगे…जीवन का अधिकार, आज़ादी का अधिकार इत्यादि नैतिकता की नींव हैं | पर भोजन का उदाहरण लेते हैं…शाकाहारी भोजन उपलब्ध होने पर भी मांसाहार करने पर मांसाहारियों द्वारा नैतिकता का सवाल क्यों नहीं उठता ? बकरी, मुर्गी, गाय, और मनुष्य के मांस के प्रति हमारा अलग-अलग नजरिया और नैतिकता क्या केवल उनकी उपयोगिता और और ‘नैतिक कीमत’ के आधार पर है ? दुनिया में किस आधार पर किसी मनुष्य को मारकर खाने को स्वीकार नहीं किया जाता है ? क्या हमने मनुष्य के जीवन को किसी मुर्गी या बकरी के जीवन से ज्यादा कीमत नहीं दी है जबकि हम भी उनकी तरह ही पृथ्वी की एक प्राणी प्रजाति ही हैं ? मांसाहार में भी कितने लोग खुद ऐसा कर सकते हैं कि वे किसी जानवर की परवरिश करें, फिर उसे खुद काटें, खुद साफ़ करें, खुद पकाए और फिर खाएं…यानि इस पूरी प्रक्रिया से गुजरें और फिर खुद को टटोलें की क्या वे इसके बाद उस जानवर जानवर को खा पाते हैं ?…अगर हाँ तो उनकी नैतिकता की सीमा बड़ी है …या छोटी ? किसके नजरिये से ‘बड़ा’ या ‘छोटा’ मानेंगे ? कोई ‘बड़ा’ कहेगा कि इतना करने के बाद भी खा पा रहा है तो हाँ कम-से-कम अपने चित्त के साथ इमानदार है…कोई दूसरा ‘छोटा’ कहेगा कि इतना करने के बावजूद, उस जानवर को खुद पालने के बाद, जाने-अनजाने में उसके साथ एक सम्बन्ध बनाने के बावजूद उसको मारकर खा रहा है | हर कोई अपनी  नैतिकता को महान या बेहतर सिद्ध करते रहता है | शाकाहार में भी कुछ ऐसा ही है – अगर मैं दूध पी रहा हूँ तो बछड़े को उसकी माँ के दूध से महरूम कर रहा हूँ पर क्योंकि मानवीय आर्थिक/ सामाजिक संरचना में गाय/ भैंस हमारी गुलाम है और इसलिए उसका दूध किसी-न-किसी को तो बिकना ही है इसलिए मेरे इस एहसास होने के बावजूद दूध ना लेने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा इसलिए मैं दूध खरीद लेता हूँ | ये क्या मेरी नैतिक सहूलियत नहीं हैं ? तो क्या मैं जितनी नैतिकता बर्दाश्त कर सकता हूँ उतनी ही अपनाता हूँ और हर कोई ऐसा ही करता है ? किसी मनुष्य या समाज में मनुष्यों को मारकर खाने में, बलात्कार में कोई नैतिक द्वन्द या ग्लानि नहीं होगी तो वो वह भी करेंगे, और हमें क्या उसे गलत कहने का अधिकार होगा ? ‘आध्यात्मिक’ जन भौतिक चीजों को निकृष्ट मानेंगे, वैराग, ब्रह्मचर्य को बेहतर और दैवीय मानेंगे, पर उनके नजरिये से घर-परिवार परिवार के त्याग करने पर परिवार जन, मित्र जन इत्यादि को जो दुःख और पीड़ा हुई होगी वो उसके ‘अपराधी’ भी तो कहे जा सकते हैं ? उनकी नैतिकता की सहूलियत में वे उन जनों की इस पीड़ा को बर्दाश्त कर गए, कोई ग्लानि महसूस नहीं की और अपने नजरिये/ प्रयास को महान मानकर उसपर बढ़ते रहे | पर वैराग्य लेने पर विवेकानंद की माँ, बहन, भाई के भावनात्मक कष्ट का जिम्मेदार विवेकानंद नहीं है ? बुद्ध के बौद्धत्व की कीमत यशोधरा और राहुल ने नहीं चुकाई ? पर बुद्ध को परिवार त्याग करना जायज लगा…उसकी नैतिकता की सहूलियत इसे बर्दाश्त कर पायी | दलितों, अश्वेतों, महिलाओं, गरीबों इत्यादि का उत्पीडन हुआ है और अभी भी होता है…जो करते हैं उनकी नैतिकता की सीमा छोटी/ बड़ी है जिसमें ऐसा करने में कोई आपत्ति नहीं होती |

हम लोग शायद कुछ मूलभूत नैतिकता की धारणाओं में सहमती रखते हैं और सबसे वैसा करने की उम्मीद करते हैं हैं – जोकि हमारे संविधान में मूलभूत अधिकार के रूप में लिखें हैं | बस मन में यह सवाल उठता है कि किसी और द्वारा इन अपेक्षाओं के उल्लंघन करने पर हम खुद को अपनी सहूलियत के पैमाने पर टटोलें और दुसरे के ‘कुकृत्य’ करने पर उसके साथ सहिष्णुता और सहानुभूति रखें | जानवर भी पीड़ा महसूस करते हैं पर उनके मूलभूत अधिकार तो किसी संविधान में नहीं लिखे हैं | प्रकृति के मूलभूत अधिकार, जिसका हम नाश कर रहे हैं ? (नेशनल जियोग्राफिक मैगज़ीन में पढ़ा था कि इक्वेडोर पहला देश है जिसने प्रकृति के अधिकारों को संविधान में शामिल किया है और किसी नदी, किसी जंगल इत्यादि की क्षति होने पर कोई भी नागरिक उस नदी या जंगल की तरफ से अदालत में न्याय की गुहार कर सकता है ) | ऐसा शायद इसलिए भी है कि अगर इस सहूलियत को सवाल करने के फेर में पड़ें तो लगेगा कि ऐसे तो जी ही नहीं पाएँगे और धीरे-धीरे सब कुछ त्याग करके, किसी को नुकसान न पहुचाने की फिराक में आखिरकार आत्महत्या करनी पड़ेगी…कोई आधार कोई पैमाना ही नहीं रह जाएगा…क्या करना है क्या नहीं इसके नियम ही नहीं बन पाएँगे…सही-गलत का निर्णय नहीं दे पाएँगे…अफरा-तफरी मच जाएगी | इसलिए हम अपनी सहूलियत की सीमा बना लेते हैं और उसके अनुसार विचारों और कर्मों की श्रेष्ठता की श्रेणियां बनाकर अपने समाज की संरचना करते हैं, फिर उस ‘मायाजाल’ में मग्न रहते हैं, उस पहिये को चलाते रहते है, संसार और जीवन का खेल खेलते रहते हैं…

 

vile virtue

 
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Posted by on January 20, 2016 in Uncategorized

 

Online Resources for Students & Educators (Basic List…for initiation)

self

Self-Education is, I firmly believe, the only kind of education there is. – Isaac Asimov

This is an attempt by me and my friend Ashwini, assisted by our other friends, to create a simple to use, basic yet useful list of online resources. It is primarily for K-12 students and educators in India but everyone will find it beneficial and a number of these resources can also be used by college students and adult learners too. Having gone through our own dismal education in school and engineering colleges, having wandered in our inner and outer life looking for direction and opportunities to fully use our potential, and then having travelled a little around India and tried a few initiatives, we realised that the crisis of perspective & expertise is acute in large number of Indian youth which starts at school and gradually kills the passion in life. On the other hand, there are really great free online resources for students which they could use for self-education to build themselves up and open the eyes of their minds and hearts to do something fulfilling in life. I personally came to know about a number of these resources towards the end of my engineering after having struggled and drifted in vain; Ashwini knew a number of them during engineering but did not have the perspective to use them optimally. We feel that if students could become aware of some learning resources online at an early age and begin their process of learning, this crisis could be largely avoided. We therefore create this list to reach out to as many students and their parents/ teachers.

There is a sad, dangerous and ridiculous attitude towards sex, love and sex education in our society! To counter that, we have started the list with links on Gender, Teenage Issues, Sex Education; however, we need to take up sex education not just as a health issue but more importantly as a ‘love’ issue, concerning one’s emotions, and happiness. We have also tried to raise another important and taboo issue of pornography which ruins many a minds and lives.

The focus is on creating a list of few resources which will be simple to use, very basic, & covering a diverse range of topics. This list is NOT meant to cover ‘everything’- we find that irrelevant and unnecessary: we believe that if someone really uses these few resources only and gets intrinsically motivated to self-educate herself/ himself, then she/ he will find a great number of resources on the Internet on her/ his own.

हमने इस लिस्ट में हिंदी के भी कुछ बहुत अच्छे संसाधन शामिल किये हैं | हमें यह एहसास हुआ कि जिनके पास कंप्यूटर / इंटरनेट नहीं है या जो अँग्रेज़ी भाषी नहीं हैं, उनके अवसर काफ़ी कम हो जाते हैं क्योंकि इंटरनेट में ज़्यादातर संसाधन अँग्रेज़ी में हैं और हिन्दी या अन्य भाषाओं में ऐसा काम बहुत ही कम है  | फिर भी हमारा यकीन है कि प्रयास करने पर सभी लोग इस लिस्ट का बहुत लाभ ले सकते हैं; और यह प्रार्थना है कि आप अँग्रेज़ी सीखने का खुद प्रयास करते रहें | साथ ही आपसे अनुरोध है की इंटरनेट में हिन्दी में शिक्षा-संबंधी संसाधन मिलने पर आप हमें बताएँ ताकि हम उन्हें इस लिस्ट में शामिल कर सकें |

हमारे समाज में सेक्स के प्रति गजब का और दुखद नजरिया है ! किशोरों की यौन शिक्षा न होने के कारण भयंकर क्षति हो रही है । इसलिए सबसे पहले यौन शिक्षा के लिंक दिए गए हैं;  मगर यौन शिक्षा को केवल स्वास्थ्य के नज़रिए से ही नहीं बल्कि भावनात्मक, प्रेम और सुख के नज़रिए से देखना भी बहुत ज़रूरी है |। इसमें बाल यौन उत्पीड़न की भी बात करना जरुरी है- इस विषय पर कमला भसीन की हिंदी पुस्तक पाने के लिए मुझे  ईमेल लिखें (लिस्ट में दिया गया लिंक अंग्रेजी की पुस्तिका का है) | इसी प्रकार नारियो के मासिक धर्म (पीरियड्स) की जानकारी के लिए “मेंस्ट्रूपीडिया” वेबसाइट और कॉमिक्स का लिंक दिया है | पोर्नोग्राफी (अश्लील चलचित्र) के बारे में भी बात नहीं की जाती जोकि एक भयावह वास्तविकता  है – हमने उसके लिए भी लिंक्स दिए हैं  |

For those who are interested in finding more resources can either simply do a Google search and email to me as well for a Master List we have made which contains more resources.

Finally, do write your comments below, write to me at ashu.bhakuni@gmail.com, as well as help in making this list better yet simple, short and diverse.

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*The page will be updated continuously. Kindly share your resources & feedback to enrich this page.

Firstly, install ‘Youtube Adblocker’ and ‘AdBlock’ extensions/ add-ons to your Chrome or Firefox web-browsers to keep yourself away from distractions and nonsense on the internet, especially pornographic material that you click on accidentally! This will save huge amount of your mental energy as well as time, and in case of porn, your humanity.

 

Gender, Teenage Issues, Sex Education

(Kindly use your judgement & validate properly before following advice on health issues)

 

 

Career, Scholarships, Higher Education

  • United States – India Educational Foundation (USIEF) – Promotes mutual understanding between the nationals of India and the U.S. through the educational exchange of outstanding scholars, professionals and students

  • Swaraj University – A very unique university. The focus of the programme is on self-designed learning and on green entrepreneurship, including exploration of basic business skills within the context of ecological sustainability and social justice.

(Request for help: We need to put up a good section on making students aware about the huge diversity of careers they can choose, especially in India. How can that be done? In the above links there is limited info and the list of higher education institutions in India is just a collection of names of colleges/ universities and not very useful for this purpose.)

 

Initiatives to Participate In

  • Public Programmes at IUCAA

  • NASA’s competitions for students

  • Microsoft Imagine Cup – A global student technology program and competition that provides opportunities for students across all disciplines to team up and use their creativity, passion and knowledge of technology to create applications, games and integrate solutions that can change the way we live, work and play.

  • Google Science Fair – A global online science and technology competition open to individuals and teams from ages 13 to 18

  • Doodle 4 Google – Creative contest for children to make Doodles that will appear on Google’s home page

  • Pratham Storyweaver Contribute to this open source platform that hosts stories in languages from all across India and beyond

  • Zooniverse Participate in citizen science projects as volunteer to help scientists and researchers

  • Gyan Setu Science volunteers – A volunteering program to conduct science-based workshops for school children in the remote areas of developmentally challenged states in India- Arunachal Pradesh, Asam, Jammu-Kashmir, Chhattisgarh, Nagaland, Odisha, Jharkhand and Sikkim.

 

All Topics

  • खान एकेडेमी – हर विषय की वीडिओज़

  • NCERT books – Download NCERT books for free

  • Quora – A great platform to ask questions to people across the world and receive answers

  • TED talks – One of the best & most interesting education tools; short video talks on every topic by people across the world

  • TED-Edu –  Children specific videos by TED

  • TEDx – Independently organized TED events

  • How Stuff Works – Explains thousands of topics with video and illustrations so you can learn how everything works

  • Pinterest – A  a visual discovery tool that you can use to find ideas for all of your projects and interests based on the contribution of people across the world on the particular topic

  • National Geographic Magazine – A great magazine on diverse topics with amazing photos

  • National Geographic Kids – A great magazine by Nat Geo for kids

  • Khan Academy – Short online video tutorials on almost every topic

  • Coursera–  Free online courses from the world’s top universities

  • EdX Free online courses from the world’s top universities

 

 

Science & Maths

  • Arvind Gupta Gallery An amazing website for thousands of innovative science experiments from every-day materials + thousands of books…हिंदी में भी (See also: Arvind Gupta’s TED talk)

  • IUCAA SciPop –  It is aimed at making people aware of the importance of Science education as well as to getting students genuinely interested in Science and motivating them towards taking up a research career towards its advancement. This includes regular special lectures, science-toy making, novel experiment development, programs encouraging discovery etc. Special workshops for Teachers exposing them to new, simpler and child-friendly teaching methods are also a part of SciPoP activities. Encouraging present Science students and teachers through the use of Astronomy is also one of their motives.(See also: IUCAA recommended readings on Science)

  • HHMI biointeractive – Great resources for biology/ life science

  • XKCD (What If) – Serious scientific answers to hypothetical questions to arouse your questioning attitude. Ask your own questions too!

  • Physics Girl – A resource for fun physics videos and other materials about physics and topics related to physics

  • Scitech Daily – Latest update on Science & technology

  •  Ask a Mathematician / Ask a Physicist

  • At Right Angles magazine – Azim Premji Foundation’s magazine for school Mathematics

  • Better Explained – Maths lessons using examples and historical connotations

  • NRICH – University of Cambridge initiative for Maths education

  • Great blogs by Maths teachers around the world

  • Google for Education

  • Mumbai Science Teachers Association – An organisation taking up the cause of Science education in India, for both teachers & students. It organises various competitions and workshops. It’s vision is to see that the next generation students are well versed and aware of the scientific developments globally and as a result they contribute effectively to the scientific research and environment enhancement within the communities they live in.

 

 

Computer Programming

 

 

Free Books

 

 

Free Documentaries

*Best method is to search IMDB for various documentaries’ titles and descriptions and then search on Google for those documentaries or use torrent.

  • “Top Documentary Films” website

  • “Films For Action” website

  • “Documentary Heaven” website

  • Suggested documentaries – We have tried to list a few documentaries from different domains that will make the viewer question, reflect, feel agitated and inspired. (In case a link does not work, please google it and search the video).

    • Cosmos: A Personal Voyage – A beautiful and inspiring documentary presented by astronomer Carl Sagan which leads us on an engaging tour of this grand universe, our Earth, and life.
    • Earth: Power of the Planet – Dr Iain Stewart tells the story of how Earth works and how, over the course of 4.6 billion years, it came to be the remarkable place it is today. (Ep 1- Volcanoes, Ep 2 – Atmosphere, Ep 3 – Ice, Ep 4 – Oceans, Ep 5 – Rare Earth)
    • Planet Earth – Dazzling, state-of-the-art high-definition imagery in this breathtaking documentary series of 11 episodes made in 5 years features footage of some of the world’s most awe-inspiring natural wonders – from the oceans to the deserts to the polar ice caps.
    • Life – Our planet is teeming with myriad life forms, both plant and animal, all interlocked in a struggle for survival. As time goes on, some living things are forced to adapt and change to survive. This series chronicles some of the most unusual, if not downright bizarre, behaviors that living organisms have devised to keep their species alive. The 11-episode series was four years in the making, taking camera crews to every continent and habitat.
    • The Genius of Charles Darwin – Evolutionary biologist Richard Dawkins shares the profound discoveries about life on Earth from the work of Charles Darwin and explains natural selection, philosophical & social implications of the theory, and the opposition to it from religious communities.
    • Samsara – Filmed over nearly five years in twenty-five countries on five continents, this beautiful documentary without any narration takes one through the various facets of this world of ours.
    • Human – Filmmaker and artist Yann Arthus-Bertrand spent 3 years collecting real-life emotional stories from more than 2,000 women and men in 60 countries. Those emotions, those tears and smiles, those struggles and those laughs are the ones uniting us all. Vol 1, Vol 2, Vol 3
    • Consuming Kids: The Commercialization of Childhood – It desperately needed light on the practices of a relentless multi-billion dollar marketing machine that now sells kids and their parents everything from junk food and violent video games to bogus educational products and the family car.
    • Killing Us Softly 4: Advertising’s Image of Women – Focuses on images of women in advertising, in particular on gender stereotypes, and the shocking effects of advertising on women’s self-image, and the objectification of women’s bodies.
    • Sext Up Kids: How Growing Up in a Hyper-Sexualized Culture Hurts Our Kids
    • Hot Girls Wanted – A documentary about young women who have been drawn into the sex trade – and how easy it is for a web-savvy generation to end up making porn.
    • Nero’s Guests – A moving and disturbing documentary depicting the story of India’s farmer suicides as experienced by P. Sainath, a Magsasay award winning journalist.
    • India Untouched – This film is perhaps the most comprehensive look at untouchability ever undertaken on film. Spanning eight states and four religions, this film will make it impossible for anyone to deny that untouchability continues to be practiced in India.
    • Raam Ke Naam – A 1992 documentary by Indian filmmaker Anand Patwardhan. The film explores the campaign waged by the Hindu fundamentalists to build a Ram temple at the site of the Babri Masjid in Ayodhya, as well as the communal violence that it triggered. A couple of months after Ram ke Naam was released, VHP activists demolished the Babri Masjid in 1992 provoking further violence.
    • The Story of India – In this six-part thrilling series, Michael Wood embarks on a thrill-packed journey of India, from the ancient times to modern day. (Request: Kindly share the online link of the episodes of this documentary series)

 

 

Magazines

Education

  • चकमक  – एकलव्य (भोपाल) द्वारा प्रकाशित बच्चों के लिए पत्रिका

  • संदर्भ – एकलव्य (भोपाल) द्वारा प्रकाशित शिक्षकों के लिए पत्रिका

  • शैक्षिक दख़ल – शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों का साझा मंच; पिथौरागढ़, उत्‍तराखण्‍ड से प्रकाशित छमाही पत्रिका

  • खोजें और जानें – विद्या भवन सोसायटी तथा अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय,बंगलौर द्वारा संयुक्‍त रूप से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका का उद्देश्‍य शिक्षकों तथा शिक्षा में रुचि रखने वाले व्‍यक्तियों तक ऐसी सामग्री पहुँचाना है जो उनके रोजमर्रा के शैक्षिक कार्य को और अधिक सार्थक बना सके

  • शिक्षा की बुनियाद – विद्या भवन सोसायटी तथा अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय, बंगलौर द्वारा संयुक्‍त रूप से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘शिक्षा की बुनियाद’ का उद्देश्‍य बुनियादी शिक्षा के मुद्दों पर विमर्श करना है

  • Learning Curve – It aims to reach out to teachers, teacher educators, school heads, education functionaries, parents and NGOs, on contextual and thematic issues that have an enduring relevance and value to help practitioners. It provides a platform for the expression of varied opinions, perspectives, encourages new and informed positions, thought-provoking points of view and stories of innovation.

Science, Technology, Mathematics

 

 

Other Great Websites

  • TRUCE – An organization of educators who work to counteract the harmful impact of media and marketing on children (download this important report also)

  • The Better India – Great positive news stories of action-takers from across India

  • Zen Pencils A cartoon blog which adapts inspirational quotes into comic stories

  • Brain Pickings Diverse reading content from  cross-disciplinary interestingness, spanning art, science, design, history, philosophy

  • Instructables – DIY How To Make Instructions  – Documentation platform for Do It Yourself activities

  • Teachers Of India portal (Hindi)

  • Teachers Of India portal (English)

  • Teachers As Transformers – IIM Ahmedabad की सुन्दर पहल, प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों के नवाचारों का संकलन और प्रसार करने के लिए (IIM Ahmedabad’s wonderful initiative to capture the efforts and innovations of primary school teachers)

  • Quillpad – भारतीय भाषाओं में टाइप करें

  • BookBox – Animated stories that help improve reading & language learning skills for children to enhance their reading skills in a fun way in their own language and also for language learning using SLS(Same language Subtitling) with the color swipe in perfect timing with the videos.

  • बुक बॉक्स – बच्चों को अपनी और अन्य भाषाओं में पढ़ना सीखने के लिए एनिमेटेड वीडिओज़ जिनमें वीडियो में बोली जा रही भाषा के ही शब्द वीडियो में साथ-साथ दिखाए जाते हैं । इसे दूरदर्शन के कार्यक्रम ‘रंगोली’ में भी प्रयोग किया गया था |

 

 

Facebook Resources for Educators

  • दीवार पत्रिका : एक अभियान – इस समूह को बनाए जाने का उद्देश्य ‘दीवार पत्रिका’ से संबंधित विचारों, अनुभवों, गतिविधियों और समाचारों को एक दूसरे के साथ बांटना है, ताकि दीवार पत्रिका एक अभियान का रूप ले

  • Education Entrepreneurs India – A platform for sharing exciting resources and ideas on the education sector and social entrepreneurship

  • People In Education – This group brings together a diverse set of people interested in education – students, teachers, parents, researchers, artists, filmmakers, NGOs, librarians, publishers, poets, storytellers, theatre practitioners, policy makers, journalists, homeschoolers, etc.

  • The Best Facebook Groups for Art Teachers

  • Physics Girl page – For the love of physics – cool phenomena, news, outreach, and physics found in everyday life

 

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Kindly write your feedback in comments below on the usefulness of this list, or to share an online link with us. 

 
6 Comments

Posted by on January 1, 2016 in Uncategorized

 

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प्रतिबिम्ब #21

मन में ये विचार आया कि डायरी के इन पन्नों को मैं जब दूसरों से साझा करता हूँ तो क्या मैं केवल नकारात्मक अनुभवों को लिखता हूँ ? स्कूल के बांकी शिक्षकों से व्यक्तिगत रूप से और ईमेल के जरिये मैं कई सकारात्मक अनुभवों को साझा करता हूँ…पर सवाल उठता है कि ऐसे ज्यादातर अनुभव मेरी डायरी के पन्नों पर क्यों नहीं उतरते ? मैं डायरी तभी लिखता हूँ जब कुछ भावुक अनुभव और सीख हो…तो क्या मुझे छूने वाले ज्यादातर अनुभव केवल वहीँ हैं जो शिक्षा और सामाजिक तंत्र के प्रति मेरे अन्दर के आक्रोश और दुःख को कुरेदते हैं ? क्या यह नकरात्मकता की निशानी है ? या इसलिए कि इन शिक्षकों के साथ जो सकारात्मक अनुभव मैं बांटता हूँ वो मैं अंग्रेजी में लिखता हूँ और उसका हिंदी अनुवाद काफी समय लेता है ? या मैं खुद की और शिक्षा/ समाज की खामियों को इतनी बारीकी से समझना चाहता हूँ कि कुछ दिखने या समझ में आने पर अपनी चेतना का विस्तार महसूस करता हूँ और मनुष्य के दमन के खिलाफ क्रुद्ध भी महसूस करता हूँ और इस अनुभव को संजोने की चाह होती है ? पता नहीं…शायद ये सभी कारण हैं |

आक्रोश को मैं जरुरी मानता हूँ पर बौद्धिक नकारात्मकता से चिढ और डर है….TISS में कविता की सभाओं में भी लगभग सभी कवितायेँ और चर्चाओं में कई बार सामजिक, धार्मिक और राजनैतिक सड़ांध को कोसा जाता था और मैं नकारात्मकता के उस माहौल में दुःख के साथ सोचता था कि क्या भयावह वास्तविकताओं के बीच जागरूकता और सामाजिक परिवर्तन के लिए दी जा रही शिक्षा में उमंग, उम्मीद, सकारात्मकता, ख़ुशी का स्थान गायब हो जाता है ?!! क्या हममें से कोई अपनी कविता में उम्मीद और सेवा के अनगिनत योद्धाओं का हर्शीला बखान देकर आशा का संचार नहीं कर सकता ?!! समाज की बुराईयाँ पढ़ते, देखते, समझते हुए कहीं हमारा चश्मा नकात्मकता की धुल से तो नहीं ढक गया है ?!! परिवर्तन और सेवा के लिए दी जाने वाली शिक्षा का परिणाम तो युवाओं में भयावह हकीकतों के बीच भी फूल उगाने की हिम्मत, प्रेम और उमंग का संचार करना होना चाहिए ना ?

त्रिपुरा के इस स्कूल में आने के बाद मुझे अपने आक्रोश को और अधिक सकारात्मकता और प्रेम से जोड़ने का अवसर मिला | पर उससे पहले यह एहसास होना जरुरी था कि मेरी नज़रों में भी नकारात्मकता की धूल है – कई सारे प्रयासों की प्रत्यक्ष कमियों और असफलताओं के पीछे छिपे अनदेखे श्रद्धापूर्ण प्रयास और मंशाओं को देख पाना मैं अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनता हूँ | जैसे, स्कूल में बहुत जगह छोटे कागज में प्रिंट करके टेप से चिपकाया गया है “बिजली बचाओ”, “कंप्यूटर इस्तेमाल न हो तो बंद कर दें”, “लाइट और पंखे इस्तेमाल न होने पर बंद कर दें”, “पानी बचाएं” इत्यादि | मैं जानता हूँ और प्रत्यक्ष रूप से देखता हूँ कि यह पूरी तरह से निष्प्रभावी है क्योंकि सारे लिखित संदेशों की तरह कुछ ही दिनों में हम इनके भी आदि हो जाते हैं और यह हमें दिखने बंद हो जाते हैं…बिजली और पानी पहले की तरह बर्बाद होते रहते हैं | पर मेरे लिए यह देख पाना और एहसास कर पाना जरुरी था कि किसी ने बिजली और पानी बचाने के बारे में सोचा होगा, फिर मेहनत करके यह सन्देश टाइप किये होंगे और प्रिंट निकले होंगे, फिर उन कागज की कई पट्टियों को काटा होगा, फिर जगह-जगह जाकर टेप से मेहनत करके उन छोटी पट्टियों को चिपकाया होगा ! इस सब में कितना समय लगा होगा और पर्यावरण और स्कूल के प्रति कितना समर्पण भाव रहा होगा ?!! इसे सोचकर मैं आनंदित हो जाता हूँ और सकारात्मक रहकर प्रयास करता रहता हूँ- बौद्धिक और परिणाम-केन्द्रित होने पर मुझे केवल इस प्रयास की असफलता दिखती | ऐसे सारे प्रयासों में मैं अब उसके पीछे छिपे प्रयास और प्रेम को देखने की कोशिश करता हूँ |

इसी प्रकार हर दिन स्कूल में कई छोटे-बड़े प्रयास होते रहते हैं जो उनके निष्प्रभाव या सीमा या असफलता के बावजूद मुझे हर दिन बहुत ख़ुशी देते हैं…इस स्कूल की अनंत संभावनाओं का निरंतर स्मरण कराते हैं…इन लोगों के समर्पण और बच्चों और समाज के प्रति सेवा भाव की ख़ूबसूरती दिखाते हैं…मेरे अन्दर भावनाओं का उबाल लाते हैं कि सब कमियों के बावजूद यह स्कूल स्वर्ग है…! कक्षा 5 में विज्ञान की युवा शिक्षिका, जोकि शांत और चुपचाप रहती है, बच्चों को अरविन्द गुप्ता के प्रयोग कराते रहती है, पुस्तकालय में ले जाकर किताब के बाहर ब्रह्माण्ड के अनेक तथ्यों के बारे में पढ़ाती है, बच्चों के कार्यों की प्रदर्शनी लगाती हैं | विज्ञान के दुसरे शिक्षक स्कूल की वनस्पतियों और आस-पास के जानवरों के ऊपर कक्षा की गतिविधियाँ करते हैं | कई विषयों में किताबों के बहार जाकर वास्तविक जीवन से जोड़ने का प्रयास होता है और सृजनात्मक गतिविधियाँ कराई जाती हैं | मैदान में खेल के शिक्षक सभी को शारीरिक रूप से तंदरुस्त रखने के प्रयास कराते हैं और अक्सर लड़कियों के साथ खुद खेलकर उन्हें किनारे बैठे रहने से रोकते हैं | गणित की शिक्षिका बच्चों में रूचि जगाने के लिए अलग-अलग उपाय सोचती है और रोचक गतिविधियाँ कराती है…पिछले हफ्ते कक्षा 8 और कक्षा 9 के बच्चों के लिए उन्होंने स्कूल की दीवारों पर अलग-अलग जगह सवाल चिपकाए थे और बच्चों को समूहों में काम कर उन्हें एक निश्चित क्रम में हल करना था- सभी बच्चों का उत्साह और हल्ला और एक दीवार से दूसरी दीवार की तरफ दौड़ना देखने लायक था ! सफाई करने वाले भैया अपनी इच्छा से दिन भर कुछ-न-कुछ काम करते रहते हैं और आजकल कारपेंटर भैया अपनी इच्छा से स्कूल की सुन्दरता के लिए एक बड़े से लकड़ी के ठूंठ को मगरमच्छ का आकार दे रहे हैं | महीने भर शिक्षकों के चिंतन सत्र और प्रशिक्षण होते रहते हैं और हर दिन बेहतरी के प्रयास और वार्तालाप होते हैं | स्कूल के बाद और स्कूल के बाहर भी स्कूल के लिए परिवार से अपना व्यक्तिगत समय निकालकर दिन-रात काम करना आम है | ऐसे अनगिनत प्रयास हर दिन होते हैं और इस सब को देखकर मेरे मन में भावनाओं का सागर उमड़ आता है और कई बार दुःख भी होता है कि अगर इन सब की क्षमता, अनुभव, अपनी छात्रावधि में मन की आँखें खोलने के अवसर और बेहतर होते, नित अध्ययन-चिंतन की आदत होती, तो ये और क्या कुछ नहीं कर देते ?!!! इन सीमाओं के कारण कभी-कभी बहुत मेहनत के बावजूद भी प्रगति और सफलता उतनी नहीं हो पाते पर संघर्ष शाश्वत सत्य है और हर किसी का रास्ता अलग होता है…पर मुझे स्वर्ग का एहसास इन्हीं प्रयासों में लगता है और मैं इन सबके बीच रहकर मैं खुद को भाग्यशाली महसूस करता हूँ | बड़े-बड़े बौद्धिकों, देश-विदेश में खूब पढ़े-लिखे कुशल और तेज धुरंधरों से कहीं ज्यादा सुख, संतुष्टि और अपनत्व में इंक सबके बीच महसूस करता हूँ…और ऐसे ही बांकी साधारण और सरल लोगों के बीच में | यह एहसास ही मुझे प्रेरित करता है, कमी ढूँढने की लत लगाता है, और सुधार के लिए जोश, उमंग, आक्रोश, नकारात्मकता और सकारात्मकता जगाता है | हर दिन सोचता हूँ कि इस स्वर्ग में खुद को हर निचोड़ देना है…हर दिन सोचता हूँ कि ऐसे लोग और ऐसा समर्पण फिर कहाँ मिलेंगे ?!!

 
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Posted by on December 30, 2015 in Uncategorized

 

प्रतिबिम्ब #20

अपने सहकर्मी मित्र के कक्षा 7 में पढने वाले बेटे से फिर उनके घर में मुलाकात हुई | लैपटॉप पर विडियो गेम्स खेलना उसकी दैनिक आदत हो चुकी है | सुबह उठते ही पहले लैपटॉप या मोबाइल ढूंढना, स्कूल जाने से पहले विडियो गेम खेलना और इस कारण अक्सर नाश्ता और बस छूट जाना, स्कूल के बाद घर आकर फिर खेलना, रात सोने तक खेलना और किताबों के साथ 10-15 मिनट ही टिक पाना, स्कूल का हर काम इन्टरनेट में खोजना और फिर पावरपॉइंट में कॉपी-पेस्ट करना | वह दोस्तों को पेन ड्राइव में गेम्स और बांकी चीजें देने का काम भी रहता है और घर में अच्छा इन्टरनेट होने के कारण दोस्त भी उससे चीजें मंगाते रहते हैं- उसके लिए शायद सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर खुद को इस तरह महत्व मिलना सुखद होता होगा | मुझे यकीन नहीं होता कि प्रेम से और बिना भय के परवरिश करने के चक्कर में उसके पिता ने गलत समझ में उसे खुली छूट कैसे दे दी ?! वो खुद दिन भर अपने काम के कारण लैपटॉप पर बैठे रहते हैं और काम के अलावा घर से बाहर नहीं निकलते | बेटे के साथ उनकी बातचीत ‘क्या पढ़ा? स्कूल में क्या पढ़ा ?’ इत्यादि के अलावा नहीं होती (यह भी शायद बांकी परिवारों से ज्यादा ही होगा !) तो बेटे के मन में भी शायद इसी माहौल का प्रभाव पड़ता होगा और खुद का लैपटॉप होने की इच्छा और उसपर काम करने की इच्छा और प्रबल होती होगी- विडियो गेम्स और बांकी चलचित्रों का प्रभाव तो वैसे भी काफी ललचाने वाला होता ही है | उसके पिता ने उसे अपना पुराना वाला लैपटॉप दे दिया है और उसपर इन्टरनेट इस्तेमाल करने की भी आज़ादी है ! इस पूरे चक्र में जो वो बच्चा अपना कीमती वक्त, ऊर्जा और जीवन बर्बाद कर रहा है वह देखकर मुझे गहरा दुःख होता है |

इस बार वह जो नया गेम लाया उसमें काफी विविधता थी | उसको खेलते देख एक वाकिये से मुझे और धक्का लगा | इस गेम को खेलते वक्त अलग-अलग किरदार बनने का मौका मिलता है उस दिन गेम में वह एक गाँव की लड़की था और गेम में गाँव के बांकी बच्चों के साथ लुका-छिपी खेल रहा था | गेम की लुका-छिपी असली दुनिया में जैसे हम खेलते हैं वैसी ही थी पर यह सोचकर मैं स्तब्ध रह गया जब मैंने उससे पूछा “असली में भी लुका-छिपी खेलते हो ?” और बिना लैपटॉप से नजर हटाये उसने कहा “समय ही नहीं मिलता” !!! वास्तविक दुनिया और जीवन से समय निकालकर वह लैपटॉप के सामने घंटों घर में बैठकर विडियो गेम की दुनिया के बच्चों के साथ लुका-छिपी खेल रहा था |

एक और रोचक चीज देखने को मिली | अक्सर वह अपनी टी-शर्ट उठाकर और बल लगाकर देखता है कि उसकी ऐब्स बन रही हैं कि नहीं ! स्कूल के सारे लड़कों में, छोटों से लेकर 10वीं तक, टी.वी. में आने वाली रेसलिंग का बुखार है | घरों में वे टी.वी. में उसे देखते हैं और फिर खेल में और स्कूल में वैसे ही लड़ने की कोशिश करते हैं | शायद टी.वी. में लड़ने वाले खिलाडियों के भीमकाय शरीर को देखकर वह इतना प्रभावित हो चुका है कि वह ऐब्स की चाहत में बल लगाकर खुद का पेट देखते रहता है और मन-ही-मन उम्मीद करता है कि वह भी वैसा ही दिखे | स्कूल में कभी उसे लंच के वक्त मैदान में देखता हूँ तो वह अक्सर अपने दोस्तों के साथ हवा में लात चलाने और कुश्ती करने की कोशिश करता है | एक दिन 10वीं का एक बच्चा भी गर्व से मुझे अपनी चोट यह बताते हुए दिखा रहा था कि वह उसे अपने दोस्त के साथ रेसलिंग करते वक्त लगी; उसके दोस्त का भी पैर सूजा हुआ था…और दुसरे दिन मैंने देखा कि वह एक अपने कद से छोटे सहपाठी को कक्षा में ही उठाकर रेसलिंग की तरह पटकने की कोशिश कर रहा था- यह सोचे बिना की सीमेंट में या डेस्क में गिरने से भयंकर चोट लग सकती है | स्कूल में बच्चों के खेल भी टी.वी. से प्रभावित होते दिखे- रेसलिंग के अलावा जब टी.वी. में कबड्डी आ रही थी तो स्कूल में सारे बच्चे कबड्डी खेलते हुए दिखे; टी.वी. से कबड्डी ख़त्म होते ही उन्होंने ने भी कबड्डी खेलना बंद कर दिया |

उस कक्षा 7 के बच्चे से कई बार बात करने के बाद और खुद बचपन में विडियो गेम्स इत्यादि के प्रभाव को जानने के कारण मुझे नहीं लगता कि अब बात करने से वह इसे छोड़ेगा- वह खुद कहता है कि वह समझता है कि वह अपना समय बर्बाद कर रहा है और वह लैपटॉप और ‘वर्चुअल वर्ल्ड’ में इतना घुस चुका है कि लैपटॉप बंद करने के बाद वास्तविक दुनिया से उसे डर लगता है और वह उससे बचना भागना चाहता है | पर सबसे बड़ी त्रासदी है कि उसके पिता उसके साथ समय व्यतीत नहीं करते और बांकी बच्चों का ट्यूशन में व्यस्त होने के कारण और घर से बाहर जाने में पाबन्दी होने के कारण दौड़-भाग और खेल कूद के अवसर भी नहीं हैं | वर्ना कोई दिशा दे, कोई साथ में समय बिताए, कुछ सृजनात्मक कार्य करे तो क्यों न वह भी अपनी क्षमता का विकास करता?! उन दिनों मैंने छोटी-छोटी कई कोशिश की: खाना बनाते वक्त उसे लहसून और प्याज छिलने को कहा और सिखाया (इससे पहले वह खुद अपना खाना भी नहीं लेता था और कई खाने के बाद प्लेट भी नहीं उठता था); खाने के बाद उसे बर्तन धोने में लगाया और पूरे समय साथ में रहकर उसे करना सिखाया, पानी की बचत के बारे में बताया, महिलाओं और उनके घर में आने वाली बाई के जीवन में बताया; झाड़ू करने की प्रेरणा उसे खुद आई; उसके साथ गणित और विज्ञान पढ़ते वक्त चर्चा की और चीजों के बारे में वास्तविक समझ और बुद्धि के उपयोग के बारे में चर्चा की | यह बीच-बीच में थोड़ी देर तक होता था और वह कई बार वास्तव में पढने और समझने का प्रयास करता था पर विडियो गेम की आसक्ति प्रबल थी और बार-बार उसपर लौट जाता था | इन्हीं चर्चाओं में मैंने उससे जीवन में सृजनात्मक कार्य करने, समय का अर्थपूर्ण प्रयोग करने, अनेकों अर्थपूर्ण कार्य और पढने के बारे में भी चर्चा की और उससे कहा कि अगर वह बदलना चाहता है तो हम साथ में आगे के लिए योजना बना सकते हैं | उसने हांमी भरी और इसके लिए मैंने उससे अगली सुबह, मेरे जाने से पहले, जल्दी उठकर मेरे साथ बैठने को कहा | अगले दिन वह देर में उठा, रात में विडियो गेम खेलने के कारण और उठने के बाद फिर खेलता रहा | मैं निराश हो गया और दिन होते-होते जाने की तैयारी करने लगा क्योंकि मुझे लौटना था | मेरे जाने के समय पर उसने अपने पिता से मेरे साथ आगे की योजना बनाने की बात कही, इसलिए क्यंकि बहुत समय से वह उससे खेलना बंद कहने में थे | पर समय हो चुका था और मैं लौट आया | वह वापिस उसी रास्ते पर लौट गया | संभावनाएं बहुत हैं, हर बच्चे के साथ; पर क्या हमारे पास समय और धैर्य है ?

 
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Posted by on December 27, 2015 in Uncategorized

 
 
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